' भगवान शिव ' की आस्था को बेचते ' मोदी- योगी '? - संजीव सिंह AAP - DAINIK JHROKHA

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Thursday, August 2, 2018

' भगवान शिव ' की आस्था को बेचते ' मोदी- योगी '? - संजीव सिंह AAP

' भगवान शिव ' की आस्था को बेचते ' मोदी- योगी ' - संजीव सिंह AAP


आम आदमी पार्टी उत्तर प्रदेश  पूर्वांचल प्रांत अध्यक्ष श्री संजीव सिंह ने बीजेपी योगी और मोदी हमला बोलै है। उन्होंने लिखा है कि, सावन मास की पवित्रता में जहाँ आस्थावान कावरियाॅ/ श्रद्धालु गेरूआ वस्त्र में कावङ के साथ गंगा जल लेकर उसकी शुद्धता को बरकरार रखते,नंगे पाँव चलते, बोल बम बोलते हुए कठिन तपस्या के साथ भगवान शंकर के शिवलिंग पर जलाभिषेक कर अपनी आस्था को पूजते है!

वही वाराणसी में विश्वनाथ मंदिर परिक्षेत्र के सह मंदिरों का विध्वंश करने वाली योगी सरकार अर्थात् भाजपा अब भगवान शिव के आस्था का व्यापारीकरण करते हुए कावरियो को " मोदी योगी " का फोटो लगा टीशर्ट बाँट रही है जो शिव के महात्म्य को बेंच रही है। आखिर बोल बम बोलते शिव भक्त तय करे कि गेरूआ वस्त्र की शुद्धता " भगवान शिव और बोल बम " लिखे नारे से बची रहेगी या मोदी योगी के 2019 के राजनैतिक प्रचार से ?

तय करें, जहाँ टी शर्ट में लिखा है " योगी आपके पास में है, मोदी आपके साथ है !" तो फिर भगवान शिव कहाँ है ? या शिव की क्या आवश्यकता है या नहीं ?

क्या मोदी- योगी " भगवान शिव " के समतुल्य हो गये ह ? - संजीव 


मानता हूँ कि धर्म और राजनीति, ईश्वर और राष्ट्र या कौम हर जमाने में हर जगह साथ चलते है । किसी कौम की किंवदंती उसके दुःख और सपनों के साथ उसकी चाह , इच्छा ,आकांक्षाओ का प्रतीक है साथ साथ जीवन की तत्व उदासीनता और स्थानीय,संसार इतिहास का भी। क्योंकि हिन्दुस्तान में यह अधिक होता है।

राम और कृष्ण ने जहाँ मानवीय जीवन व्यतीत किया वही शिव अजन्मे और अंत है। तभी वह ईश्वर की तरह अनंत है।शायद शिव की ही किंवदंती है जिनकी कोई सीमा नहीं तभी असीम किंवदंती में शिव की दो घटनाये मुझे उनके महात्म्य से आह्लादित करती है। एक जब देव और असुरों में " समुन्द्र मंथन " हुआ तब अमृत के पहले विष निकला। 

कौन इसे पिये ये देवो और असुरों में भ्रम बना रहा जबकि शिव इस खेल का हिस्सा नहीं थे फिर भी कारवां आगे बढ़े उन्होंने " विषपान " किया और विष को गर्दन में रोके रखा तब " नीलकंठ " कहलाये।दूसरा पूज्यनीय है जब एक भक्त ने पार्वती की साथ पूजा करने से मना कर दिया तब शिव ने आधा पुरूष और आधा नारी का रूप लिया जो " अर्धनारीश्वर " कहलाये।

शिव के इस अपाद मस्तिष्क को देखकर परस्पर यही सोच हर सच्चे शिवभक्त की होती है कि उसे भी शिव ऐसे मस्तिष्क के साथ उन्मुक्त ह्दय से सिंचित करे जिससे जीवन की मर्यादा और सार्थकता बनायें रखें।

तय करें शिव भक्त कि क्या हम धर्म के खरीददारो को जवाब देंगे या नहीं..? या हिन्दू धर्म की अंतिम परिणति भाजपा या किसी दल के चरणों में है...?

 संजीव सिंह 
आम आदमी पार्टी 

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