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| ' काल के कपाल ' कलशयात्रा के उम्मीदों के कमाल तक - संजीव सिंह 'आप' |
भारत रत्न,कवि ह्दय,पत्रकार,लाजवाब वक्ता , सादगीभरा सरल व्यक्तित्व पूर्व प्रधानमंत्री स्व.अटल बिहारी बाजपेयी जी की वैचारिकी से ज्यादा व्यक्तिगत गुण " सबको साथ लेकर " चलने की कला के अधिकांश भारतीय राजनीति के पंडित छः दशकों से मुरीद रहे।क्योंकि अटल जी से मतभेद था उन्हें लेकिन मनभेद नहीं रहा, तभी अपने मौत के बारे में भी सादगी की सोच स्व.बाजपेयी जी रखते हुए कहते थे कि -
" मौत की उम्र क्या दो पल भी नहीं,
जिंदगी-सिलसिला आजकल की नहीं,
मै जी भर जिया, मै मन से मरू,
लौटकर आऊंगा, कूचे से क्यों डरू। "
आज जहाँ पूरा देश एक अभूतपूर्व शोक में डूबा है। वही उनकी मौत के दिन 16 अगस्त से लेकर अगले दिन 17 अगस्त को आम जनता के उनके अंतिम दर्शन-अंतिम यात्रा तथा अब देश के राज्यों में कलश यात्रा के नाम पर अटल जी की मौत का " राजनैतिक व्यापारीकरण " पुरे योजनाबद्ध कार्यक्रम का अंग दिखता है। तभी मोदी सरकार चुनावी वर्ष 2019 की मार्केटिंग सहानुभूति के द्वारा भुनाने की कोशिश में लगी है जो अपने चार वर्ष की असफलता तथा जनहित के मुद्दों को छिपाने की भरपूर कोशिश में लगी है।
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कहाँ अटल जी मौत से लेकर सत्ता के सर्वोच्च पद प्रधानमंत्री के कुर्सी पर रहने तक जिस सादगी से और फकीरी के साथ जिये तभी अल्पमत की सरकार से हटते हुए कहा था। " आज प्रधानमंत्री हूँ, थोङी देर बाद नहीं रहूँगा प्रधानमंत्री बनते समय कोई मेरा ह्दय आनंद से उछलने लगा ऐसा नहीं हुआ, और ऐसा नहीं है कि सब कुछ छोङछाङ के चला जाऊँगा तो मुझे कोई दुख होगा ...!"
तो आज अटल जी के नाम पर चुनावी वैतरणी 2019 को पार करने के फिराक में मोदी सरकार " कलश यात्रा " के नाम पर ये संवेदनशून्यता व पाखंड की राजनीति क्यों कर रही है... ? जिस प्रकार पंडित जवाहर लाल नेहरु अपने मृत्यु के बाद कहा था- " कि मेरे अस्थि कलश गंगा में प्रवाहित करने के बाद बची खुची राख देश के खेतों खलिहानों में छिङक देना क्योंकि मेरी आत्मा इसी भारत में बसती है।" उसी प्रकार अटल बिहारी बाजपेयी अपने मृत्यु के बाद आत्मा की शांति चाहते थे न कि आज की तरह कलश यात्रा के नाम पर वोटों का बाजारीकरण...?"
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" कलश यात्रा " के नाम पर राजनीति करने वाली मोदी सरकार से सवाल करना चाहता हूँ कि जो मोदी सरकार पूर्ण बहुमत की सरकार से जम्मू कश्मीर में वह कार्य नहीं करा पायी । जो कार्य अटल जी ने विभिन्न दलो की साझा सरकार(एन.डी.ए) के द्वारा किया...जम्मू कश्मीर मामले को " जम्हूरियत, इंसानियत और कश्मीरियत " के तहत सुलझाने में आंशिक सफलता पायी। तभी इतिहास में पहली बार कश्मीर के चुनाव में उनके कार्यकाल में बगैर बंदूक के साये में हुआ " फियर एंड फेयर " चुनाव हुआ।
वही आज साढ़े तीन साल महबूबा- मोदी की सरकार रही जहाँ गठबंधन 2019 के गुप्त एजेंडा के तहत टूट गया , फिर कश्मीर समस्या आज बहुत बढ़ गयी है जहाँ मोदी सरकार लोकतंत्र बहाली से लेकर कश्मीरी पंडितों की समस्या तक बुरी तरह असफल साबित हो चुकी है..!
" माब लिंचिग " की घटना 1984 के सिख दंगे से लेकर 2002 के गोधरा कांड तक अटल जी ने विपक्ष के नेता से लेकर प्रधानमंत्री पद तक रहने पर हुई थी।तब वह प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी की काग्रेस सरकार से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री मा.नरेन्द्र मोदी जो कि मुख्यमंत्री गुजरात रहने तक उन्हें फटकारने और राजधर्म का पालन करने तक हिदायत दिया था।
आज पूरे देश में " भीङ का कानून अर्थात् माब लिंचिग " का जितना विकास मोदी सरकार में हुआ उतना पहले किसी सरकार में कभी नहीं हुआ था, कभी गोकशी के नाम,बच्चा चोर के नाम, गाय तस्करी के नाम पर अल्पसंख्यको को भीङ द्वारा पीटकर हत्या और महिलाओ को निर्वस्त्र कर मारना पीटना, दलित प्रोफेसर को बुरी तरह मारना पीटना।लेकिन प्रधान सेवक तथा मंत्रिमंडल शांत ....हो भी क्यो न ?
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जब संघ के नेता बोलते है माब लिचिंग तब रूकेगा जब गो मांस खाना बंद होगा। वहीं कथित गाय तस्कर को मारने वाले हत्यारों को कबीना मंत्री सम्मानित करता है लेकिन प्रधान सेवक का मौन समर्थन जारी है। कभी इसका विरोध नहीं, बढते हुए किसानों की मौत पर चुप्पी? बेरोजगारी की बढ़ती समस्या पर चुप्पी? राफेल के साथ रक्षा सौदे दलाली में भ्रष्टाचार पर चुप्पी? गैर भाजपा राज्यों के साथ असंतुलन की स्थिति ..? नोटबंदी और जी एस टी से लेकर बैंको की बढ़ती कंगाली पर चुप्पी ? इत्यादि मुद्दों को छिपाने के नाम पर अटल जी कलश यात्रा के नाम पर उनके नाम को शर्मिदा करने की कोशिश न हो।वो एक धूमकेतु की तरह रहे और हमेशा हर एक हिन्दुस्तानी के दिलों में आजीवन रहेंगे।
इसलिए अटल जी के सादगी का सम्मान करते हुए कलश यात्रा के नाम पर उनके मृतक आत्मा का मज़ाक न उङाये मोदी सरकार क्योंकि इस भारत में कोई दूसरा अटल बिहारी बाजपेयी अब जन्म नहीं लेगा न ही उनके नाम पर राजनीति करने वाले ही कभी अटल बिहारी वाजपेयी बन पायेंगे..? चाहे उनके नाम पक्षकार मीडिया के द्वारा साहेब के धूप - पसीना युक्त पदयात्रा से लेकर 2019 की पद लोलुप्ता के स्वांग यात्रा तक जीतने भी कसीदे गढ़े जाय। तभी प्रिय अटल जी के शब्दों में उन्हें मनाते हुए कहना चाहता हूँ कि -
टूटे हुए सपने की कौन सुनें सिसकी,
अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठीठकी,
हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूंगा,
काल के कपाल पे लिखता हूँ- मिटाता हूँ,
अपनों के मेले में मीत नये खोजता हूँ,
गीत नया गाता हूँ, गीत नया गाता हूँ
स्व.अटल बिहारी वाजपेयी अमर रहे
संजीव सिंह
आम आदमी पार्टी उत्तर प्रदेश

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