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| LG हाउस में केजरीवाल का धरना से हुआ पार्टी का वापसी, बीजेपी-कांग्रेस का उल्टा पड़ा दाव |
नई दिल्ली : आम आदमी पार्टी की सरकार व अरविंद केजरीवाल तीन साल तक केवल जनता तक सुविधाएँ पहुँचाने में जुटे नज़र आए। शिक्षा पर बजट का लगभग 25 फ़ीसदी और स्वास्थ्य पर लगभग 20 फ़ीसदी ख़र्च ने ज़मीन पर कैसा असर हुआ है, उसे किसी को बताने की ज़रूरत नहीं है। कुछ समय से 'आप' और अरविन्द केजरीवाल का राजनितिक भविष्य दाव पर लगा हुआ था। पार्टी और केजरीवाल पर आरोप भी लगने लगा कि इन्हें न ‘विचार’ से मतलब है न राजनीति से। ये एनजीओ छाप लोग हैं, बस। प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के पार्टी से बाहर जाने और बाद यह आरोप और राज्यसभा टिकट बँटवारे के समय हुए विवाद ने केजरीवाल की नैतिक विचारधारा धूमिल हो गया था ।
मुख्यमंत्री के पिछले एक हफ़्ते से उपराज्यपाल अनिल बैजल के दफ्तर के एक कमरे में अपने मंत्रियों के साथ बैठे केजरीवाल ने जैसे पूरी बाज़ी पलट दी। गैरकांग्रेस और ग़ैरबीजेपी (यहाँ तक कि शिवसेना जैसे बीजेपी सहयोगी भी) पार्टियाँ केजरीवाल के पक्ष में खड़े नज़र आ रहे हैं। बीजेपी विरोधी गठबंधन का केंद्र बनने की कोशिश कर रहे काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के लिए यह किसी झटके की तरह है जो बीजेपी के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं। अब मूल सवाल चुनी हुई सरकार के अधिकार और एलजी के जरिए केंद्र की तानाशाही का बन गया है जिस पर काँग्रेस कोई साफ़ लाइन लेते नहीं दिख रही है। हालाँकि पुडुचेरी में उसकी सरकार भी इन्हीं समस्याओं से जूझ रही है।
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सत्येंद्र जैन और मनीष सिसौदिया की अनशन की वजह से बिगड़ी तबियत
बतादे कि दिल्ली के पूर्ण राज्य के मामले को लेकर आम आदमी पार्टी सड़क पर उतर पड़ी है। सत्येंद्र जैन और मनीष सिसौदिया की अनशन की वजह से बिगड़ी हालत के बाद उन्हें अस्पताल पहुँचा दिया गया है, लेकिन केजरीवाल और गोपाल राय अभी भी डटे हुए हैं। मामला हाईकोर्ट में भी पहुँच गया है और उसने ‘किसी के घर धरने की इजाज़त’ जैसा सवाल उठाया है। लेकिन आम आदमी पार्टी जनता की कोर्ट में पहुँच गई है। आप नेताओं का कहना है कि वे घर-घर जाकर दिल्ली सरकार के जनहित के कामो में मोदी सरकार किस तरह बढ़ा पहुंचा रही है उसकी जानकारी दिल्ली की जनता को देंगे।
जानकारों का मानना है कि यह एक तरह से आम आदमी पार्टी के आंदोलनकारी स्वरूप की वापसी है। यही वजह है कि तमाम ऐसे लोग जो आम आदमी पार्टी से नाराज़ चल रहे थे, अब केजरीवाल के पक्ष में लिख रहे हैं। केजरीवाल का आंदोलन क्या मोड़ लेगा, इस पर सबकी नज़र है। लेकिन एक बात तो तय है कि इसके ज़रिए केजरीवाल अपनी खोई हुई नैतिक आभा फिर से पाते दिख रहे हैं।
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धरना की राजनीती में बीजेपी-कांग्रेस का उल्टा पड़ा दाव
इसी बिच आठ दिनों बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। उन्होंने ने दिल्ली में चल रहे गतबिधियो को ड्रामा बताया। राहुल के इस बयान के बाद शोसल मीडिया में बहुत किरकिरी हुआ। जानकारों का कहना है कि कांग्रेस किसी भी हाल में केजरीवाल से बचना चाहती है। लोगो का मन्ना है कि 2019 का चुनाव को मद्दे नजर देखते हुए फैसला लिया है।
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आने वाले लोकसभा चुनाव में कई क्षेत्रीय पार्टिया कांग्रेस के समर्थन में नहीं है। कई पार्टिया चाहती है की केजरीवाल के नेतृव में 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा जाये।

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