अख़बारी और सरकारी नहीं है अंबेडकर जयंती : रवीश कुमार - DAINIK JHROKHA

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Sunday, April 15, 2018

अख़बारी और सरकारी नहीं है अंबेडकर जयंती : रवीश कुमार


अख़बारी और सरकारी नहीं है अंबेडकर जयंती : रवीश कुमार
रवीश कुमार 



अंबेडकर जयंती की शुभकामनाएं। आप इस जयंती को अख़बारों में छपे सरकारी विज्ञापनों से मत आंकिए। नेताओं की आपसी होड़ के कारण अंबेडकर के विज्ञापन छपते हैं। मगर कोई नेता जाति तोड़ने और इसके नाम पर होने वाले उत्पीड़न के लिए पसीना नहीं बहाता है। अगर आप अपने आस-पास नज़र घुमाएंगे तो अख़बारों के इन विज्ञापनों और सरकारी कार्यक्रमों की ज़रूरत ही नज़र नहीं आएगी। 14 अप्रैल एक लोक उत्सव है। इस दिन डॉक्टर अंबेडकर की जयंती होती है लेकिन वो असंख्य लोगों की भी होती है। जब आप इसे लोक उत्सव के रूप में देखेंगे तभी आप समझ पाएंगे कि ऐसा क्या है कि आबादी का हिस्सा दिलो जान से अंबेडकर जयंती मनाता है और एक हिस्सा या तो नहीं मनाता है या फिर मनाने के नाम पर औपचारिकता निभा देता है।


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अंबेडकर जयंती के पंद्रह दिन पहले से कार्यक्रम शुरु हो जाते हैं। पंद्रह दिन बाद तक चलते हैं। मुझे ही इतने बुलावे आते हैं कि ना कहने में भी पसीने छूट जाते हैं। आपको अंदाज़ा तक नहीं होगा कि ऐसे कार्यक्रमों की संख्या लाखों में होती है। भारत भर के मोहल्लों में, गलियों में लोग अपने पैसे से, अपने संसाधनों से अंबेडकर जयंती मनाते हैं। हर कार्यक्रम में भीड़ होती है। सार्वजनिक ही नहीं, घरों में भी जयंती को अपने बच्चे के पहले जन्मदिन की तरह मनाया जाता है। लोग नए और अच्छे कपड़े पहनकर निकलते हैं। भारत में क्या, दुनिया में किसी भी नेता या विचारक की जयंती इस स्तर पर नहीं मनाई जाती है। यह लोक उत्सव भारत का सबसे आधुनिक उत्सव है। 13 और 14 की मध्य रात्रि भीम दीवाली के रूप में मनाई जाती है। असंख्य गीत लिखे जाते हैं। वीडियो बनते हैं। भीम गीत गाने वाले कलाकारों को पानी पीने की फुर्सत नहीं होती है। असंख्य प्रतियोगिता कार्यक्रम होते हैं।

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आज के सभी अखबारों में अंबेडकर जयंती पर खूब सारे सरकारी विज्ञापन होंगे मगर उन्हीं अखबारों में अंबेडकर जयंती की समझभरी रिपोर्टिंग नहीं होगी। अव्वल तो होगी नहीं और होगी तो दो चार तस्वीरें लगाकर खानापूर्ति कर दी जाएगी। हम सभी को समझना चाहिए कि अंबेडकर जयंती अख़बारी और सरकारी कार्यक्रम नहीं है, यह लोक उत्सव है। एक तबका इस जयंती की तरफ देखता नहीं, एक तबका अपने सियासी इस्तमाल के लिए देखता है और एक तबका है जो इन सबकी चिन्ता को छोड़ कर अपने बाबा साहब की जयंती मना रहा होता है।

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डॉ अंबेडकर अकेले हैं जो बाबा भी हैं और साहब भी और डॉक्टर भी क्योंकि डॉ अंबेडकर ने तार्किकता की बात की। उनकी बातों से बिल्कुल असहमत होना चाहिए। असहमति तो अंबेडकर ख़ुद ही प्रोत्साहित करते थे क्योंकि असहमति के सबसे बड़े ब्रांड अंबेसडर तो वही थे। लेकिन वे चाहते थे कि आप तार्किकता के सहारे बात करें, धार्मिकता का सहारा लेकर तर्कों को साबित न करें। जो लोग मूर्तियां तोड़ रहे हैं, वह इतनी सी बात भी नहीं समझते कि अंबेडकर ख़ुद ही मूर्तिभंजक थे। उन्होंने मूर्तियों को स्वीकार नहीं किया। मूर्तियों से अंबेडकर को कोई फर्क नहीं पड़ता है मगर तोड़ने वालों की मानसिकता से आपको फर्क पड़ना चाहिए। आपको दुख होना चाहिए कि उनकी मूर्तियां पिजड़े में कैद हैं। बगल में सिपाही पहरा दे रहा है। यह प्रमाण है कि आज भी जाति को लेकर नफ़रत किस हद तक है। सोचिए आज भी जब अंबेडकर की मूर्ति से इतनी नफ़रत है तो उन्हें मानने वालों से कितनी नफ़रत होगी। लेकिन अगर आप जयंती को समझना चाहते हैं कि उन घरों में जाइये जहां मनाई जा रही है, हो सके तो अपने घर में मना लीजिए। जाति को तोड़िए, मूर्ति को नहीं।

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