प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की किसानों के हित में लाई गई महत्वाकांक्षी योजना "फसल बीमा योजना" से किसानों को तो कुछ नही मिला लेकिन बीमा कम्पनिया माले-माल हो गई। ' प्रधानमंत्री बीमा फसल योजना ' के बर्ष 2016 -17 के क्रियान्वयन से ऐसा लगता है कि यह योजना बीमा कम्पनियों की व्यवसायिक क्रिया बिधि की भेंट चढ़ गई। इसमें शासकीय रिपोर्टिंग अधिकारियोंं के बीमा कम्पनियों के सांठ-गांठ से फसल बीमा योजना केवल बीमा कम्पनियों के लिए लाभकारी सिद्ध हुई । प्रधानमंत्री के किसानों के लिए बनाई इस योजना को बीमा कम्पनियों एवं रिपोर्टिंग अधिकारियोंं और नेताओ के भ्रष्ट सांठ-गांठ ने आग लगा दी। इसमें पूर्व की तरह सारी मार किसानों पर आई। प्रधानमंत्री बीमा फसल योजना के क्रियान्वयन के दौरान राज्य सरकार एवं स्थानीय प्रशासन तथा विभिन्न संगठन विशेष संवेदनशील होकर कार्य करते तो किसानो को ऐसी दुर्गति न होती।
The wire पर ख़बर छपी है कि टाइम्स आफ इंडिया के जयपुर संस्करण ने फ़सल बीमा योजना पर अपनी ख़बर हटा ली। सरकार का दबाव? इस ख़बर में संवाददाता ने लिखा है कि फ़सल बीमा योजना से बीमा कंपनियों को कई हज़ार करोड़ का मुनाफ़ा हुआ है। किसानों को कुछ नहीं मिला। जब ये योजना लाँच हो रही थी तभी प्राइम टाइम के दो तीन शो तो किए ही होंगे कि किस तरह यह योजना बीमा कंपनियों को अमीर बनाने के लिए है। आप पुराने शो देख सकते हैं। ख़ैर किसानों के लिए नहीं है। तब लोगों ने सुना नहीं, उल्टा गालियाँ दी कि आप मोदी का विरोध कर रहे हैं। इस पोस्ट के कमेंट भी यही लोग कहेंगे मगर आप दस बीस किसानों को फोन करके पूछ सकते हैं। अपवाद छोड़ दें तो किसान ठगा ही गया है। हाल ही में मध्य प्रदेश से कई ख़बरें आईं कि बीमा के नाम पर दस रुपये बीस रुपये मिले हैं। जबकि बीमा कंपनियों ने प्रीमियम जमकर वसूला है।
बीबीसी में खबर छपी है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत मध्य प्रदेश में कुछ रुपये हर्ज़ाना मिलने पर किसान शिकायत कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि फ़सल बीमा के रूप में चार रुपये या सत्रह रुपये तक का मुआवज़ा मिलने से वो ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। मध्य प्रदेश प्रदेश के सिहोर ज़िले के तिलरिया गांव में 52 किसानों को कुल 3,061 रुपये 50 पैसे मुआवज़ा मिला है। किसान इसे अपने साथ किया गया एक किस्म का मज़ाक बता रहे हैं। बाकी अन्य ज़िलों में भी किसानों की ऐसी शिकायत है। सिहोर ज़िले में पिछले तीन महीने में 12 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. ये वही ज़िला है जहां पिछले साल 18 फ़रवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक जनसभा कर प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत की घोषणा की थी।
CAG ने 21 जुलाई को संसद में एक रिपोर्ट सौंपी है। जिसमें कहा गया है 2011 से लेकर 2016 के बीच बीमा कंपनियों 3,622.79 करोड़ की प्रीमियम राशि बिना किसी गाइडलाइन को पूरा किए ही दे दी गई। आप जानते होंगे कि प्रीमियम राशि का कुछ हिस्सा किसान देते हैं और बाक़ी हिस्सा सरकार देती है। इन कंपनियों में ऐसी क्या ख़ास बात है कि नियमों को पूरा किए बग़ैर ही 3,622 करोड़ की राशि दे दी गई। CAG ने कहा है कि प्राइवेट बीमा कंपनियों को भारी भरकम फंड देने के बाद भी, उनके खातों की ऑडिट जांच के लिए कोई प्रावधान नहीं रखा गया है। सरकार की लगातार सभी लगभग सभी योजना औंधेमुंह गिर गया। देश के अर्थब्यवस्था के बारे में Daily Window में छपी खबर में सरकार के रवैये को दर्शाता है।

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