सीए कमा नहीं रहे हैं बल्कि वे भी परेशान हैं - DAINIK JHROKHA

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Friday, September 22, 2017

सीए कमा नहीं रहे हैं बल्कि वे भी परेशान हैं

CA are not earning, they are also upset in GST


CA on GST India
PM Narendra Modi 

प्रक्रिया इतनी जटिल है कि सीए कमा नहीं रहे हैं बल्कि वे भी परेशान हैं। पूरा महीना उनका उसी में लग जाता है। कई सीए ने मुझे बताया  है कि उन्हें भी ये जीएसटी समझ नहीं आ रही है। लास्ट मिनट में लोगों को पता चला कि गूगल क्रोम (Google Chrome ) से फाइल नहीं होगी, इंटरनेट एक्सप्लोरर (Internet Explorer) से होगी। ऐसा क्यों कोई जबाब नहीं है। 




ई-सिग्नेचर के बारे में बहुतों को पता नहीं है। कई लोगों ने कहा है कि जीएसटीएन उनका ई-सिग्नेचर पहचान ही नहीं रहा है। उसके कारण फार्म ही नहीं लोड हो पा रहा है। एक व्यापारी ने बताया कि तीन दिन तक कोशिश की मगर जीएसटीएन ने उनके डिजिटल सिग्नेचर को अपलोड ही नहीं किया। कई समस्याएं ख़ुद समझ नहीं पा रहा जिसके कारण यहां नहीं लिख पा रहा हूं। 





छोटे उद्योग धंधों पर जीएसटी ने बुरा प्रभाव डाला है। उनकी लागत बढ़ गई है और मुनाफा घट गया है। जीएसटी पर कई जानकारों से बातचीत के बाद कई लोगों ने अच्छी प्रतिक्रिया दी है। जिसमें सीए भी हैं और व्यापारी भी हैं। किसी ने नहीं कहा कि मैं GST के बारे  जनता हु। इन समस्या का ज़िक्र करने का मतलब यह नहीं कि व्यापारी टैक्स नहीं देना चाहते। दो नंबर का धंधा तो आज भी हो रहा है, आप चाहें तो पेंट व्यवसाय में पता कर सकते हैं। आपने सुना है कि किसी बड़ी पेंट कंपनी या नकली पेंट बनाने वालों पर छापे पड़े हों। आपको प्रोपेगैंडा पर विश्वास होता है तो आप लोग विश्वास करिये मगर जो बात सही है वो सही है।




ई-वे बिल क्या है? (What is a E-Way Bill )

E-way Bill एक प्रकार का इलेक्ट्रॉनिक बिल है जिसके अंतर्गत भेजे जाने वाले या मगवाये जाने वाले माल और उस पर लगने वाले GST की पूरी जानकारी होगी।  E-Way Bill के आधार पर ही GST Officers ट्रांसपोर्ट किये गए माल की चेकिंग करेंगे और यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि माल पर उचित GST लगाया जा चुका हैं। ई-वे बिल क्या है। एक व्यापारी अगर 50,000 से अधिक का सामान बेचता है तो ख़रीदने वाले को बिल की डिटेल मेल करेगा। फिर ख़रीदार उसे जीएसटी की वेबसाइट पर जाकर अपने एकाउंट में भरेगा। इसे E-1 फार्म कहते हैं।अभी जब 1 अक्तूबर से ई वे बिल शुरू होगा तो और भी जटिलताओं का सामाना करना होगा। 10 किमी दूर अगर माल बिना ई वे बिल के गया तो पकड़ाने का ख़तरा रहेगा, पकड़ाएगा कोई नहीं, आप भी जानते हैं, जमकर दो नंबर का धंधा होगा। ई-वे बिल क्या है। यह फार्म लेकर वो अपने बिक्रेता को मेल करेगा, बेचने वाला अपने मूल व्यापारी यानी होल सेलर को देगा। तब जाकर E-1 के नंबर के आधार एक और फार्म E-2 जनरेट होगा। दोनों फार्म का प्रिंट आउट लेकर ही वह माल ख़रीदने वाले को भेज सकेगा। इस बिल के बिना वो माल नहीं भेज सकता है।






एक व्यापारी एक दिन में ऐसे 50 बिल काटेगा, 50 लोगों से ई-वे बिल मांगेंगे और जब उनसे मिलेगा तब कहीं वह अपना E-2 बिल जनरेट करेगा और माल डिस्पैच करेगा। गांव कस्बों की हालत सोच लीजिए फिर दिमाग लगाइये कि क्या यह संभव है। यह सब जानकारी लोगों से मिले फीडबैक के आधार पर लिख रहा हूं। 19 सितंबर की ख़बर है। फाइनेंशियल एक्सप्रेस में छपी है। स्टेट बैंक आफ इंडिया का रिसर्च कह रहा है कि सितंबर 2016 से ही अर्थव्यवस्था की चाल सुस्त हो गई थी और यह कोई तात्कालिक संकट नहीं है। मतलब तीन साल की मेहनत का यही नतीजा निकला?




पिछले के पिछले शनिवार बिजनेस स्टैंडर्ड में टी एन नाइनन ने संपादकीय लिखा और बताया कि सात साल से भारत की आर्थिक प्रगति एक ढर्रे पर चल रही है। सरकार को चेतावनी दी है। मगर टीवी चैनलों के ज़रिए लोग किस मसले पर बात हों, इसका प्रबंधन हो रहा है। जैसे जैसे यह संकट गहराएगा आप देखेंगे कि हिन्दू मुस्लिम टापिक की भरमार हो जाएगी। सारे मुद्दे उसी दिशा में जाते दिखेंगे।





आईटी सेल वालों की भी नौकरी जाएगी। वे सोचते हैं कि मैं इस मंदी से ख़ुश हूं। मैं उनके स्तर का मूर्ख नहीं हूं। मंदी से मेरी ज़िंदगी भी प्रभावित होगी। ये तो मैं कभी नहीं चाहूंगा कि मंदी आए। न अपने लिए न किसी और के लिए। लेकिन जिन्होंने नोटबंदी की, वो किस विश्वविद्यालय से ये आइडिया लेकर आएंगे, कभी न कभी ये सवाल तो सामने आएगा। चाहें आप इसे जितना मर्ज़ी हिन्दू मुस्लिम टापिक से ढंक लें। 


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